एक्स UP CM Kalyan Singh ने गवर्नर रहते हुये भी Rajasthan में बनाया ये रिकॉर्ड, जानिए Full Story

कल्याण सिंह (kalyan singh) तो चले गये लेकिन उन्हें अभी भी लगातार याद किया जा रहा है। जी हां, बतौर मुख्यमंत्री उन्हें सख्त एडमिनिस्ट्रेटर के रूप में जाना जाता था। इसके अलावा 6 दिसंबर 1992 (babri masjid demolition) के बाद से उन्हें कट्टर राम भक्त और प्रचंड हिंदूवादी के रूप में भी जाना गया। इतना ही नहीं वह नकल विरोधी अध्यादेश लाने के लिए भी जाने गए। लेकिन क्या आपको पता है कि कल्याण सिंह का कार्यकाल यूपी तक सीमित नहीं रहा। वह 10 बार विधायक, दो बार सांसद, दो राज्यों के राज्यपाल भी रहे हैं। तो हम आपको बताते चलें कि कल्याण सिंह (kalyan singh as Rajasthan governer) ने बतौर राज्यपाल भी एक रिकार्ड कायम किया था। वो।राजस्थान के राज्यपाल रहे हैं आइए हम आपको बताते हैं कि क्या है आख़िर पूरा मामला।

विस्तृत जानकारी के लिए देखें हमारी रिपोर्ट।

भाजपा के दिग्गज नेता और कट्टर राम भक्त कल्याण सिंह अब हमारे बीच नहीं है। उनका तेरहवीं संस्कार भी संपन्न हो चुका है। लेकिन उन्हें याद लगातार किया जा रहा है। यूं तो उन्हें एक राम भक्त और कट्टर हिंदूवादी के रूप में याद किया जा रहा है। लेकिन वो जहां भी रहे वहां उन्होंने अपनी एक अलग ही छाप छोड़ी। 60 साल लंबा राजनीतिक जीवन जीने वाले कल्याण सिंह ने मंडल-कमंडल की राजनीति के दौर में भाजपा जैसी पार्टी को चुना। जबकि उन दिनों भाजपा ब्राह्मणों और बनियों की पार्टी कही जाती थी। लेकिन कल्याण सिंह हमेशा धारा के विपरीत चलने के लिए जाने जाते थे। उन्होंने कभी भेड़ चाल को फॉलो नहीं किया। अपना एक अलग रास्ता बनाया। शायद इसीलिए संगठन से लेकर राज्यपाल तक जहां भी रहे जबरदस्त काम किया। वो वसीम बरेलवी का एक मशहूर शेर है न कि –

जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा

किसी चराग़ का अपना मकाँ नहीं होता।।

अगर शुरुआती दिनों की बात करें तो उन्हें संगठन का मास्टर कहा जाता था। एक साधारण परिवार से आने के बावजूद उन्होंने नई बुलंदियां छुईं। वो गरीब परिवार से आते थे। उन्होंने टीचर के तौर पर अपनी पहली नौकरी शुरू की। लेकिन वो आरएसएस से भी शुरू से जुड़े थे।

उसके बाद जब जनसंघ बनी तो उससे भी जुड़ गए। बीजेपी के फाउंडर्स में से एक रहे। यूपी में बीजेपी को खड़ा करने, पूरी यूपी में घूम-घूम कर संगठन बनाने का क्रेडिट उन्हीं को जाता है। हजारों कार्यकर्ताओं के नाम मुंहजबानी याद रखते थे। इसीलिए सवर्णों की पार्टी कहीं जाने वाली भाजपा ने मंडल कमंडल के दौर में उन्हें अपना सीएम फेस बनाया था। ये कोई छोटी मोटी बात नहीं थी। लेकिन कल्याण ने भी इस फैसले को सही साबित कर दिखाया। उनके चेहरे पर लड़े इलेक्शन में बीजेपी को 222 सीटें आईं थीं। उसके बाद बतौर सीएम छोटी सी पारी में जबरदस्त काम किया। हालांकि साल 1999 में कुछ मतभेदों के चलते उन्होंने पार्टी छोड़ दी थी।

लेकिन फिर साल 2004 में उन्हें अटल बिहारी बाजपेई फिर मना कर वापस ले आए। आपको बता दें कल्याण सिंह ने अटल बिहारी वाजपेई के चलते ही पार्टी छोड़ी थी और वही यह अटल बिहारी उनको वापस मनाकर पार्टी में लाए। क्योंकि हो ना हो वाजपेयी भी इस बात को समझते थे की जात-बिरादरी से परे कल्याण सिंह ही वो शख्स हैं जिन्होंने बीजेपी को पूरे यूपी में खड़ा किया है। हालांकि पार्टी में दोबारा आने के बाद कल्याण सिंह का पुराना दबदबा नहीं बन सका। 2009 में फिर उन्होंने एक बार पार्टी छोड़ी लेकिन 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले वो फिर बीजेपी में लौटे। उन्होंने ही मोदी को ये मंत्र दिया कि यूपी का इलेक्शन ओबीसी की राजनीति पर लड़ा जाए। बीजेपी ने किया भी वही और उसे बंपर कामयाबी मिली। उसके बाद अंतिम दिनों में उन्हें राजस्थान का राज्यपाल बनाया गया था।

आमतौर पर राज्यपाल के पद को राजनीतिक रूप से एक रुखा सूखा पद माना जाता है। लेकिन कल्याण सिंह ने यहां भी जबरदस्त काम किया। आपको बता दें कि राजस्थान का राज्यपाल रहते हुए कल्याण सिंह ने वो काम किया जो आज तक कोई नहीं कर सका था। जी हां! राज्यपाल रहते हुए कल्याण सिंह ने अपने 5 साल पूरे किए। इससे पहले कोई भी राज्यपाल ये काम नहीं कर सका था। कल्याण सिंह 52 सालों में पहले राज्यपाल थे जो पूरे 5 साल अपने पद पर रहे। अगर राजस्थान की बात करें तो यहां 52 साल में 40 राज्यपाल नियुक्त हुए लेकिन कोई भी अपना टर्म पूरा नहीं कर पाया।

जैसा कि हमने आपको बताया कल्याण सिंह देसी आदमी थे। जमीन से जुड़े हुए। भारतीय संस्कृति और संस्कार उनमें कूट-कूट कर भरे थे। राज्यपाल रहते हुए भी उन्होंने इस चीज की बानगी पेश की। उन्होंने राज्यपाल रहते हुए एक ऐसी परंपरा तोड़ दी जो अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही थी। जी हां! बिल्कुल सही सुना आपने। आप जानते ही हैं कि राज्यपाल को महामहिम कहने की एक लंबी परंपरा रही है। ये परंपरा अंग्रेजों ने शुरू की थी। लेकिन कल्याण सिंह ने राज्यपाल बनने के बाद पहले ही दिन एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में आर्डर निकाला कि उन्हें अब से महामहिम नहीं कहा जाएगा। बल्कि इसकी जगह माननीय शब्द का इस्तेमाल किया जाए।

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